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पुस्तक समीक्षा: मज़बूती का नाम महात्मा गांधी

पुस्तक विवरण:

मज़बूती का नाम महात्मा गांधी 
पुरुषोत्तम अग्रवाल
राजकमल पेपरबैक्स, रुपये 299/-, 196 पेज

नवेद अशरफ़ी

‘मज़बूती’ या ‘मज़बूत’  शब्द उर्दू ज़बान से लिया गया है। जानकार कहते हैं कि उर्दू में यह शब्द अरबी भाषा से आया है और इसका मूल ‘ज़ब्त’ है। ज़ब्त यानि धीरज, सहनशीलता, बर्दाश्त या संयम। प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई किताब ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ गांधी जी के व्यक्तित्व के इसी बिन्दु पर केंद्रित है। लेखक अपनी इस रचना में गांधी जी को तपस्वी के रूप में देखते हैं और उनके व्यक्तित्व की अविरल धारा को दो किनारों ‘करुणा’ और ‘संयम’ के बीच बहता हुआ पाते हैं, वह संयम और करुणा में भी ‘संयम’ को वरीयता देते हैं क्योंकि वह मानते हैं कि ‘बिना संयम के सच्ची करुणा संभव नहीं है’। (पृष्ठ 46)

अक्सर किताबों में गांधी जी का सम्बन्ध दो शब्दों से स्थापित किया जाता है: सत्य और अहिंसा। प्रोफ़ेसर अग्रवाल अपनी पुस्तक में इस बात पर विस्तृत चर्चा करते हैं कि गांधी जी के लिए ‘सत्य’ के क्या मायने हैं और ‘ईश्वर सत्य है’ से आरम्भ होने वाली यात्रा कब ‘सत्य ही ईश्वर है’ की मंज़िल पर पहुँच जाती है। जबकि गांधी जी के लिए ‘अहिंसा’ शब्द का सीधा सम्बन्ध ‘संयम’ से है। बक़ौल लेखक, ‘मनुष्य जो कुछ है, उससे आगे कुछ होना चाहता है. मनुष्य केवल प्रकृति नहीं है, बल्कि संस्कृति भी है. हिंसा एक प्राकृतिक तथ्य है लेकिन अहिंसा एक सांस्कृतिक मूल्य होना चाहिए’। अर्थात अहिंसा का वृक्ष संयम के अंकुर से जन्म लेता है। नेशनल फ़्यूल रिसर्च इंस्टिट्यूट, धनबाद के उद्घाटन के समय 22 अप्रैल 1950 को  पण्डित जवाहरलाल नेहरु ने भी यही बात संस्कृति के प्रसंग में कही थी, ‘मन और आत्मा का विस्तार ही संस्कृति है’।

लगभग 26 पेजों की भूमिका के अतिरिक्त यह पुस्तक 6 भागों में विभक्त है। लेखक ने भूमिका में ही गांधी जी का परिचय ‘तपस्वी’ के रूप में कराया है। गांधी जी ऐसे तपस्वी थे जो कह पाते थे कि मेरी तपस्या तो वहाँ है, जहां मनुष्य की पीड़ा है, इसलिए मैं हिमालय जाकर क्या करूंगा! दिलचस्प बात यह है कि लेखक ने ‘तपस्वी’ शब्द का इस्तेमाल अंतिम अध्याय के शीर्षक में स्पष्ट रूप से किया है। दरमियानी अध्यायों में सत्य, ईश्वर, आस्था, नैतिकता, निरीश्वरवरवाद, हिन्दू, हिन्दुत्व, सनातन, तर्क, विवेक, चिंतन, कर्म, आधुनिकता, सार्वभौम मानवमूल्य इत्यादि पर केंद्रित विमर्श के ज़रिए गांधी जी की ‘तपस्या’ को समझने और परिभाषित करने का सफल प्रयास किया गया है। 

किताब का पहला अध्याय ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ दरअसल लेखक का वह लोकप्रिय व्याख्यान है जो उन्होंने 2 अक्टूबर 2005 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में दिया था। व्याख्यान की लोकप्रियता का कारण इसके शीर्षक में लेखक द्वारा ‘मज़बूती’ शब्द का चयन करना था, क्यूंकी कदाचित इस व्याख्यान से पूर्व भारतीय जनमानस ‘मजबूरी’ को ही गांधी जी का दूसरा नाम मानता आया था। 2005 से अब तक यह व्याख्यान विभिन्न वेबपोर्टलों अथवा सोशल मीडिया में बहुत पढ़ा गया है। यह पुस्तक उसी व्याख्यान का विस्तृत संस्करण है। 

मौजूद दौर में हिंसा का अभूतपूर्व साधारणीकरण और विकेन्द्रीकरण लेखक के लिए चिंता का विषय है। हिंसा मनुष्य को कमज़ोर बनाती है जबकि अहिंसा उसको धीरज और संयम प्रदान करती है, उसको मज़बूत बनती है। गांधी जी इसीलिए मज़बूत हैं क्योंकि वह अहिंसा के तपस्वी हैं। गांधी जी जिस अहिंसा की बात करते हैं वह उनके निजी नवाचार और अन्वेषण पर आधारित है और प्रोफ़ेसर अग्रवाल के शब्दों में कहें तो गांधीजी का यह कहना कि सत्य और अहिंसा शाश्वत हैं, बिल्कुल सही है; लेकिन गांधीजी की अहिंसा, परम्परा से चली आ रही अहिंसा का विस्तार नहीं है, वो उनकी मौलिक जीवनदृष्टि है। गांधी जी की अहिंसा ने अंग्रेज़ी हुकूमत की हिंसात्मक ‘सजेस्टिव पावर’ अर्थात उसके इक़बाल को चकनाचूर कर दिया था। इसीकारण गांधी जी की अहिंसा प्रासंगिक है और आज भी गांधी जी मज़बूत दिखाई देते हैं।   

दूसरे अध्याय में गांधी जी के हवाले से आस्था और विवेक पर सार्थक बहस की गई है। जब विदेश से आए हुए एक पादरी बेसिल मैथ्यूस गांधी जी की आध्यात्मिक साधना में सहायक धर्म ग्रंथों के बारे में पूछते हैं तो गांधी जी गीता, कुरान, बाइबिल का नाम लेते हैं और स्पष्ट करते हैं कि वह इन ग्रंथों के पास ‘आलोचनात्मक मानस’ के साथ नहीं जाते लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि वह इन ग्रंथों की हर बात पर राज़ी हो जाएं! ऐसा क्यूँ? आपकी कसौटी क्या है? पादरी ने पूछा। गांधी जी ने कहा, ‘मैं गीता समेत हर धर्म ग्रंथ को अपने विवेक की कसौटी पर आँकता हूँ’।

गांधी जी ईश्वर के अस्तित्व को तर्क से परे मानते थे लेकिन इस के अतिरिक्त हर धार्मिक अनुभव को परखने के लिए वह तीसरी छननी की वकालत करते हैं जो अपने ‘विवेक की कसौटी’ होती है। (जबकि पहली व दूसरी छननी क्रमश: अवतार या पैग़म्बरों की वाणी और विद्वानों की व्याख्या की होती है।) गांधी जी के यहाँ ‘तीसरी छननी’ की बाध्यता दूसरों पर नहीं है। अपने निजी अन्वेषणों मे यक़ीन रखने वाले गांधी जी ने यह छननी अपने लिए ही चुनी थी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधी जी के लिए धर्म नैतिकता को मापने का पैमाना नहीं था। धर्म के झण्डाबरदार बहुत से लोग निजी एवं सामाजिक जीवन में नैतिकता से कोसों दूर होते हैं। ऐसी स्थिति में अमुक व्यक्ति का आचरण, उसकी नैतिकता इस बात की द्योतक होगी कि उसने धर्म के मर्म को कितना आत्मसात किया है। इस अध्याय में गीता के कर्म सिद्धांत, मध्यमार्ग तथा सार्वभौम मानव मूल्यों के ज़रिए नैतिकता और आस्था पर विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ की गई हैं, विशेषकर, अहमदिया और नबुव्वत वाले मसले पर संगसारी को लेकर गांधी जी के विचार और लेखक की टिप्पणियाँ पठनीय हैं। 

किताब का तीसरा अध्याय ईश्वरविश्वास, निरीश्वरवाद, आस्था और सत्य की परिभाषाओं पर केंद्रित है। लेखक के सुझाए ये दोनों शब्द (ईश्वरविश्वास, निरीश्वरवाद) बहुप्रचालित शब्द ‘आस्तिक’ और ‘नास्तिक’ की जगह प्रयोग किए गए हैं। गांधी जी की अविचल आस्था का ज़िक्र करते लेखक कहते हैं कि तर्क और अनुभव की पूर्ण उपेक्षा कर आस्था का राग अलापना ठीक नहीं है। तर्क आधारित आस्था मनुष्य को हर घड़ी बेहतर बनने की प्रेरणा देती है क्यूंकी उसको यह भ्रम नहीं होता कि वह ही सर्वश्रेष्ठ है और उसके समक्ष सब तुच्छ हैं! यह तर्क आधारित आस्था ही इंसान को हर प्रकार की कूपमंडूकता से दूर रखती है। लेखक के अनुसार कूपमंडूकता की यह प्रवृति, विशेषकर, एकेश्वरवादी धर्मावलंबियों मे अधिक प्रबल होती है क्यूंकी उनके यहाँ शुभ और अशुभ का इकट्ठा रहना मुमकिन ही नहीं है। जबकि गांधी जी अशुभ के बग़ैर शुभ का अस्तित्व ही नहीं मानते हैं।  गांधी जी का ईश्वर में विश्वास ‘आस्था की छलांग’ के रूप में फलीभूत होता है; वह ईश्वर को मानव तर्क से परे मानते हैं और उनके नज़दीक यह आस्था की सीमा नहीं है बल्कि ‘तर्क की सीमा’ है। 

गांधी जी विवेक की छलनी से ही ‘ईश्वर सत्य है’ के बोध को ‘सत्य ही ईश्वर है’ के उत्कर्ष तक ले जाते हैं। यह तर्कशील आस्था के ज़रिए ही सम्भव हो पाता है क्यूंकी तर्क के मंच पर ही द्विपक्षीय वार्ता से इतर तीसरे विकल्प की संभावना तलाश करना सुगम हो सकता है और लेखक ने इस बात को गांधी-गोरा संवाद से स्थापित किया है। गोरा (गोपराज रामचन्द्र राव) एक तेलुगु भाषी निरीश्वरवादी थे जो गांधी जी के संरचनात्मक कार्यक्रम से प्रभावित थे और इस दिशा में लंबे समय से ज़मीनी काम कर रहे थे। उनकी प्रबल इच्छा थी कि वह ईश्वर के अस्तित्व पर गांधी जी से सार्थक विमर्श करें, लेकिन गांधी जी ने व्यस्तताओं के कारण इसका कभी समय नहीं दिया। जब विमर्श की घड़ी आई तो गोरा ने कहा मेरे संरचनात्मक कार्यों का आधार तो निरीश्वरवाद ही है क्यूंकी इससे मैं किसी के बीच भेदभाव करने के खतरों से दूर हो जाता हूँ। इस पर गांधी जी ने कहा, ‘क्या ज़रूरत है ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की?... मैं यह नहीं कहता कि मेरा ईश्वरवाद सही है और तुम्हारा निरीश्वरवाद ग़लत। हम दोनों सत्य के खोजी हैं। हो सकता है भविष्य में तुम मेरे रास्ते पर चलने लगो या मुझे तुम्हारी शैली पसंद आ जाए; या फिर हम कोई तीसरा मार्ग ही खोज लें”। सत्य (अर्थात ईश्वर) के अस्तित्व पर गांधी जी का यह कर्मोन्मुख संवाद उनकी विशालता को दर्शाता है जिसकी प्रतिध्वनि गांधी जी के देहांत के बरसों बाद भी उनके शिष्य पण्डित नेहरु की जिह्वा पर होती है: 

“सत्य पर किसी का एकाधिकार नहीं है। सत्य इतना विशाल, व्यापक और अथाह है कि उसको किसी किताब, धर्म, अथवा मस्तिष्क तक सीमित नहीं किया जा सकता है”। (भारतीय विज्ञान कांग्रेस, 14 जनवरी 1957, कलकत्ता)

अब सवाल उठता है कि मौजूदा समय में प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की यह पुस्तक कितनी प्रासंगिक है और इसे क्यूँ पढ़ा जाना चाहिए। जवाब किताब के अंतिम हिस्से में हैं जहां हमें सावरकर और गांधी में एक को चुनना है।  सावरकर के यहाँ राष्ट्र का सिद्धांत यूरोपीय परंपरा से प्रेरित है, वहाँ एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा, एक नस्ल का बोलबाला है। उनके यहाँ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी राजनीतिक उपकरण माना जाता है। हमें गांधी या सावरकर में किस को चुनना है, यह लेखक की इस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है: 

“गांधी जी द्वारा प्रेरित ‘मानवनिष्ठ भारतीयता’ में नैतिक आयाम अनिवार्यत: निहित है।… सावरकर का राष्ट्रवाद एकेश्वरवादी संस्कार में पनपी एकता के नाम पर जीवन की विविधता को बलपूर्वक नकारने वाली यूरोपीय राष्ट्रभावन से प्रेरित था।  गांधी जी सारी दुनिया की हवा के लिए खिड़कियां खुली रखते हुए अपनी ज़मीन पर पैर जमाए हुए थे। सावरकर अपनी ज़मीन की पहचान ही नहीं कर पाए”।   

गांधी जी का दर्शन और उनकी ‘मानवनिष्ठ भारतीयता’ दरअसल ऋगवेद के ‘"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" के आदर्श का ही विस्तार है। देखिए, हम इस आदर्श को और कितना विस्तार दे पाते हैं, गांधी जी की तपस्या को कितना समझ पाते हैं, और धर्म, जाति, रंग, भाषा, लिंग इत्यादि के चश्मों से हटकर प्राणी मात्र की पीड़ा को हम कितना समझ पाते हैं, यह तो समय के गर्भ में ही है। 

डॉ० नवेद अशरफ़ी मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद, तेलंगाना में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (पब्लिक ऐड्मिनिस्ट्रैशन) हैं। 

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